अर्थ-व्यवस्था मे मंदी वार्ल्ड बैंक और ई.एम.एफ.संस्थों की मुख्य भुमिका

राजीव भाई


जिस समय यह वैश्वीकरण (ग्लोबलाईजेशन) और उदारीकरण (लिब्रलाईजेशन)
शुरु हुआ था उस दिन से आज तक मैं और मेरे कई साथी पूरी बारीकी से इस पूरी प्रक्रिया को समझने का प्रयास कर रहे थे और ये हम समझना चाहते थे कि ये ग्लोबलाईजेशन है या और भी कुछ इसमें है । तो ये ग्लोबलाईजेशन शुरु हुआ तो इसके साथ बहुत सारे वायदे थे बड़ी-बड़ी बातें थीं, जो सबसे महत्वपूर्ण बात थी  वो आप शायद समझते होंगे उसको, या आपको स्मरण भी होगा कि 1990-91 में हमारे देश की अर्थ-व्यवस्था में थोड़ी सी मंदी आ गई थी तो उस रुकावट को दूर करना है तो सिवाय ग्लोबलाईजेशन या लिब्रलाईजेशन के इस देश के पास कोई अन्य मार्ग नहीं है, ऐसी बात पूरे देश में कही गई थी और मुझे बराबर स्मरण है कि हमारे देश के मूर्धन्य अर्थशास्त्री लोगों ने ये कहना शुरु कर दिया था कि "चूँकि देश के पास विदेशी मुद्रा का भण्डार बहुत कम रह गया है और हमारे पास बहुत कठिनाई से 3 सप्ताह तक इम्पोर्ट बिल चुकाने की मुद्रा है तो हमको तो कुछ करना ही पड़ेगा।" तो हमारे पास बैलेंस ऑफ प्राईसेस की क्राईसेस हो गई थी तो उस बैलेंस ऑफ प्राईसेस की क्राईसेस को दूर करने के लिये हमारी सरकार ने आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक के पास एप्रोच किया था लोन के लिये, पैसे के लिये, ऋण लेने के लिये, तो 1991 में जब आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक में भारत सरकार का पत्र गया कि भारत को शीघ्र ऋण चाहिये आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक से, तो  आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक की जैसी आदत है उन्होंने सबसे पहले ये कहना शुरु कर दिया कि आपको ऋण तो देंगे लेकिन उसके साथ हमारी कुछ शर्तें होंगी, तो आई.एम.एफ. की ओर से और वर्ल्ड बैंक की ओर से भारत सरकार को कुछ शर्तें पेश की गईं कि आप इन शर्तों को पूरा करें तो हम आपको कर्ज देने को तैयार हैं। तो वो शर्तें क्या थीं ?
वर्ल्ड बैंक और आई.एम.एफ. संस्थाओं की शर्तें क्या होती हैं?

सबसे पहली शर्त है आई.एम.एफ. और वर्ल्ड बैंक की, जब भी कोई देश कठिन परिस्थिति में जाता है तो उनका एक रटा-रटाया प्रिस्क्रिप्शन है कि सबसे पहले आप अपने देश की करेंसी का अवमूल्यन कीजिये तब हम आपको ऋण दे देंगे और इस बात को प्रस्तुत करने का तरीका अलग है, तो ये कहते हैं कि आप अपने मुद्रा का अवमूल्यन इसलिये करिये ताकि आपका निर्यात अधिक हो जाये और चूँकि आपका निर्यात अधिक होगा तो आप अधिक डॉलर्स कमायेंगे और आप अधिक डॉलर्स कमा सकेंगे तभी आप हमारे लिये हुये कर्ज को वापस कर सकेंगे। तो इसको यदि एक पँक्ति में कहूँ तो आई.एम.एफ. का एक प्रिस्क्रिप्शन है जो वो संसार के सभी देशों में लागू करवाती है कि आप एक्स्पोर्ट ओरिएंटेड डेवलपमेंट करना शुरु कीजिये, तो ये आई.एम.एफ. का पहला प्रिस्क्रिप्शन है । 

दूसरा उनका प्रिस्क्रिप्शन है कि आप जब एक्स्पोर्ट ओरिएंटेड डेवलपमेंट करना शुरु कर देंगे तो फिर एक काम और कर दीजिये अपने देश का दरवाजा खोल दीजिये कि आपके देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ आसानी से आ सकें और उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर जो आप पाबंदियाँ लगाते हैं जो रिस्ट्रिक्शन लगाते हैं उनको आप कम से कम कर दीजिये या इसे समाप्त कर दीजिये ताकि आपके बाजार में उनको व्यापार करने में कोई असुविधा ना हो, और क्यों आप अपने देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बुलाइये ? आप यदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बुलायेंगे अपने बाजार में तो इसके साथ हाईटेक बहुत आयेगा तकनीक बहुत आयेगी और जब तकनीक बहुत आयेगी तो आपके यहाँ गुणवत्ता युक्त माल बनना शुरु हो जायेंगे तो आप निर्यात अधिक कर पायेंगे। तो बहुराष्ट्रीय भी आपके बाजार में आके आपका प्रमोशन करेंगे आपके निर्यात को बढ़ायेंगे। 

तीसरा प्रिसिक्रप्शन अक्सर उनका ये रहा करता है कि आप अपने इण्टरनल मार्केट (घरेलू बाजार) में जो घरेलू उधोग को संरक्षण देते हैं वो संरक्षण देना बंद करें और यदि आप संरक्षण देना बंद करेंगे तो उसके बारे में IMF का ये मानना है कि आप एक Conservative अर्थ-शास्त्र को चलाने का प्रयास कर रहे हैं। तो आप घरेलू उधोग को प्रोटेक्शन मत दीजिये, बहुराष्ट्रीय को खुली छूट दे दीजिये पूँजी लाने की भी खुली छूट दे दीजिये और पूँजी ले जाने की भी खुली छूट दे दीजिये उनके ऊपर किसी प्रकार की भी पाबंदी नहीं होनी चाहिये और आप सब के सब फ्री ट्रेड (मुक्त व्यापार) के लिये अपने आपको तैयार कर लीजिये फिर इसके बाद कुछ और बातें भी बताई जाती हैं जैसे एक बात ये बताई जाती है कि भारत की अर्थ-व्यवस्था Competetive नहीं है तो आप जब तक दरवाजा नहीं खोलेंगे तो तब तक आपके अर्थ-व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा नहीं आयेगी और आपके अर्थ-व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा नहीं होगी आपके देश के ग्राहक को उसकी बहुत हानि होगी। तो आपकी इकानमी में प्रतियोगिता होनी चाहिये ग्राहक को उसका लाभ होना चाहिये तो इसके लिये आवश्यक है कि आप अपने बाजार में या भारत के बाजार में आने की खुली छूट दें और ऐसे-ऐसे करके वो कुछ शर्ते बताते चले जाते हैं और संसार के बहुत सारे देश हैं जो उनको लागू करते चले जाते हैं। और एक बात मैं आपको और बता दूँ कि ये जो IMF, World Bank की जो शर्ते होती हैं वो शर्ते बस संसार के निर्धन देशों पर ही लागू होती हैं, एक सूचना मैं आपको ये दे दूँ कि अमेरिका और यूरोप के देश IMF से कर्ज लेते हैं और IMF और World Bank से कर्ज लेते हैं तो जो शर्ते वो हमारे ऊपर लगाते हैं वो शर्ते अमेरिका के ऊपर नहीं लगाई जाती, क्योंकि हमेशा से वो मानके चलते हैं कि अमेरिकन इकानमी पहले से ही भूमण्डलीये है यधपि ये सबसे बड़ा झूठ है कि अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था भूमण्डलीÏत है, दूसरा उनका ये मानना है कि अमेरिकन इकानमी में बहुत प्रतिस्पर्धा है ये उससे भी बड़ा झूठ है कि अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा है। तीसरी बात जो कहते हैं कि अमेरिकन पूरी तरह से फ्री इकानमी है ये संसार का सबसे बड़ा झूठ है कि अमेरिकन अर्थव्यवस्था फ्री अर्थ-व्यवस्था है और फिर यूरोप के बारे में भी कुछ इसी तरह की बातें होती हैं। तो मेरे मन में अक्सर ये प्रश्न उठता आया है कि जब World Bank से अमेरिका भी ऋण लेता है यूरोप भी ऋण लेता है तो उनके ऊपर भी शर्ते नहीं लगाई जाती ? 
वार्ल्ड बैंक और ई.एम.एफ.संस्थों की शर्ते अमेरिका और अन्य यूरोपियन ब्लाक पर कभी लागु नहीं की जाती क्यों ?

हमारे जैसे देश जब उनसे ऋण जाते हैं तब उनके ऊपर तत्काल शर्ते लगा दी जाती हैं, तो एक बार मन में आया कि ये जो IMF और World Bank चलती हैं उसके बारे में हमें समझना चाहिये कि अमेरिकन और यूरोपियन ब्लाक के लिये वो कभी शर्ते नहीं लगाते जो संसार के दूसरी या तीसरी दुनिया के देशों पर वो लगाते हैं तो उसका इतिहास बिल्कुल स्पष्ट यह बताता है कि ये बना कैसे,World Bank  और IMF दरअसल द्वितीय विश्वयुध्द में यूरोप और अमरीकी अर्थ-व्यवस्था तबाह (नष्ट) हो गई थी यूरोप को कुछ अधिक हानि हुई थी अमेरिका को कुछ कम, तो यूरोप और अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था जो द्वितीय विश्वयुध्द में नष्ट हुई तो उस अर्थ-व्यवस्था को फिर से खड़ा करने के लिये दो इंस्टीटयूट का जन्म हुआ World Bank और IMF के नाम पर Brettenwood नाम की एक जगह है, अमेरिका में एक गाँव जैसा है अभी वो थोड़ा बड़ा नगर हो गया है वहाँ पर एक संधि हुई थी जिसमें 44 देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति शामिल हुये थे, उन लोगों ने एक संधि किया था जिसका नाम है 'Brettenwood संधि तो उस 'Brettenwood संधि के आधार पर World Bank और IMF का जन्म हुआ, द्वितीय विश्वयुध्द के बाद और जब से ये IMF और World Bank का जन्म हुआ है तब से वहाँ एक नीति चलती है, नीति ये चलती है कि IMF और World Bank में जो सदस्य देश हैं वो बिल्कुल लोकतांत्रिक नहीं हैं One Member One Vote कभी नहीं होता IMF में, और ना World Bank में होता है वहाँ अमेरिका के पास सबसे अधिक वोट हैं और अमेरिका का जो Voting share है IMF में और World Bank में भी वो करीब 20% है माने यदि अमेरिका यदि 1 वोट डालता है और उसकी जो कीमत है अगर कुल वोट की कीमत यदि 100 रुपया मानी जाये तो अमेरिका के वोट की कीमत 20 रुपये के बराबर होती है बाकी 80 रुपया की कीमत में दुनियो के सारे देश हैं और वो सारे देश की संख्या लगभग 117 है और IMF और World Bank में कभी भी लोकतंत्र आ नहीं पाया है और आने वाला भी नहीं है क्योंकि वो हमेशा से ढाँचा वैसा ही बनाकर रखना चाहते हैं। 
ये जो World Bank बना था वो इसलिये बना था ताकि दुनिया के तमाम देश युध्द के बाद द्वितीय विश्वयुध्द के बाद जब  कम अवधी ऋण (शार्ट टर्म लोन) की आवश्यकता पड़े तात्कालिक कोई पेमेण्ट की आवश्यकता पड़े तो बैलेंस आफ पेमेंट की क्राईसेस हो जाये तो IMF उसके लिये कर्ज बाँटेगा और किसी देश को यदि इंफ्रास्ट्रक्चर के डेवलपमेंट के लिये यदि लोन की आवश्यकता पड़े तो World Bank उसको बाँटेगा, तो इस तरह से बँटवारा हुआ था और उसमें एक महत्वपूर्ण बात है जो मुझे इन संस्थाओं का अध्ययन करने के बाद पता चली जो सामान्य लोगों को मालूम नहीं होती है IMF और World Bank जुड़वा कह सकते हैं एक दूसरे का, और इसमें होता क्या है कि यदि कोई देश World Bank से कर्जा लेने के लिये जाये तो World Bank की तरफ से यह कहा जाता है कि आप IMF की शर्तो को पूरा करिये, माने Cross conditionality की व्यवस्था चलती है और उसमें होता क्या है परोक्ष रूप से वो दोनो शर्ते वो लागू करवा देते हैं इन निर्धन देशों के ऊपर, और मैं कहना ये चाहता हूँ कि World Bank और IMF के तरफ से दी गई शर्ते या उसकी तरफ से दिये गये प्रिसिक्रप्शन कभी रिफार्म नहीं हो सकते ये रिफार्म शब्द का अपमान है ये World Bank और IMF बने ही हैं अमेरिकन और यूरोपियन ब्लाक की Hegemony को बनाये रखने के लिये।
 
भारतीयों से क्या गलती हुई?
हमारे यहाँ क्या त्रुटि हुई पिछले 7 वर्षो में हमारे यहाँ प्रेस ने विशेषकर अंग्रेजी प्रेस ने IMF और World Bank के प्रिसिक्रप्शन को रिफार्म के नाम पर प्रचारित करना शुरु कर दिया और IMF और World Bank की शर्तो को Globalization के रूप में प्रचार करना शुरु कर दिया। Globalization एक बहुत बड़ा व्यापक शब्द है और IMF और World Bank की शर्त बहुत छोटा शब्द है। तो हमसे जो त्रुटि हुई है पिछले 7 वर्षो में विशेषकर इस देश के Intellectual Class से सबसे बड़ी त्रुटि ये हुई कि IMF और World Bank की शर्तो को हमारे देश ने रिफार्म मानने की बड़ी भारी भूल की और IMF और World Bank की शर्तो को हमारे देश में New economy Policy के रूप में प्रचारित किया गया उसमें सरकार की हिस्सेदारी तो है ही, सरकार से अधिक इस देश में मीडिया की जिम्मेदारी थी। इन्हें इस देश के लोगों को साफ-साफ बताना चाहिये था कि इस देश में जो कुछ हो रहा है वो विश्व बैंक और IMF की शर्तो के कारण हो रहा है उसमें भारत सरकार अपनी इच्छा से शामिल है इस पर संदेह था।  



Nov 26, 2013


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