भारत अर्थव्यवस्था का ईतिहास

राजीव भाई

हमारे इस देश मे कोई आजादी आई नहीं ,यह देश आज भी उतना ही गुलाम है जितना कभी अंग्रेजो के समाने मे था, बल्की आज तो पहले से भी जादा हमारा देश गुलाम हैं । देश की व्यवस्थायें अंग्रेजो के जमाने से जादा गुलाम हैं । ब्रिटिश संसद मे १८१३ मे बहस चल रही है के भारत को गुलाम बनाने के लियें भारत की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करना हैं इसके लिये भारत के व्यापारीयोंओं को बर्बाद करना होगा । यदि भारत के व्यापारी बर्बाद हो जयेंगें तो ईस्ट ईन्डीया की कम्पनी का माल इस देश मे बिकने लगेगा । इस बहस मे एक अंग्रेज अधीकारी बीलव्र फोर्स क्या कहता हैं कि हमे भारत मे फ्री ट्रेड करना हैं । फ्री ट्रेड का मतलब "ब्रिटीश उत्पादो का भारत के गांव - गांव मे बिकना, ब्रिटीश उत्पादो का भारत के बाजार मे भर जाना और भारतवासीयों द्वारा जादा से जादा ब्रिटीश उत्पादो का उपभोग करना " और इसके दुसरे भाग में बीलव्र फोर्स कह रहा है कि "भारत मे बहुत अच्छा कंचा माल है जो सरा का सरा ब्रिटेन मे आयें जिस पर हमें एक पैसा भी खर्च ना करना पडे और उस माल को ब्रिटेन मे तैयार करके भारत के बाजारो मे बेचना और ब्रिटिश के माल पर कोई टेक्स नही लगेगा, यह हैं फ्री ट्रेड । यह फ्री ट्रेड आज भी भारत मे चलाया जा रहा हैं ग्लोबलीजेशन और लिब्रललीजेशन के नाम पर, जो १८१३ मे भी अंग्रेजो द्वारा चलाया गया था इस देश मे यहां की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने के लियें तो इसमे नया क्या हैं । तो १८१३में ईस्ट ईंन्डीया कम्पनी की सरकार फ्री ट्रेड के लियें अलग - अलग पोल्सियां बन रही है और वो पोल्सियां क्या है ? सब से पहली पोल्सी हैं कि ब्रिटिश माल पर कोई टेक्स नहीं लगेगा और भारतीये माल पर अधिक से अधिक टेक्स लगाया जाए । परिणाम क्या निकलेगा कि ब्रिटेन का माल सस्ता हो जाएगा और भारतीयें माल महंगा हो जायेंगा । ताकी ब्रेटेन का माल भारत के गांव -गांव मे बिके और भारत के व्यापारीयों का माल नही बिकेगा और भारत के व्यापारी बर्बाद हो जायेंगें । और भारत के व्यापारी बर्बाद हो गए तो भारत कि अर्थव्यवस्था भी बर्बाद हो जायेंगी । ब्रिटेन के माल पर को टेक्स नहीं और नाही कोई आयात टेक्स भी नहीं लगेगा । तो इस के लियें वह भारत में विभीन्न कानून बना रहे है इस देश में ताकी इस देश को बर्बाद किया जा सके । इसके लिये भारतवासीयों पर जो माल बना रहे है सबसे पहला टेक्स लगाया गया सेंट्राल एक्साईज एण्ड सोल्ट टेक्स ( वस्तूओ के उत्पादान पर टेक्स) जो भारत के लोग उत्पादन कर रहे है उस पर टेक्स लगाया । और वो लोग जब उन वस्तूओं को बाजार मे बेचने जाते है तो उसपर भी टेक्स (सेल्स टेक्स) और अब जो माल बैचने से जो आमनदनी हूई है उस पर भी टेक्स लगा दिया आयेकर ( ईन्काम टेक्स) । तथा वस्तूओं के लाने ले जाने पर भी एक टेक्स लगा दिया ऑक्ट्रोये टेक्स (चूंगी नाका टेक्स) तथा ईस्ट ईण्डीया कि कम्पनी भारत में कोई पुल बना देते थे तो उस पूल पर से कोई गाडी जायें तो उस पर भी टोल टेक्स। इस प्रकार के पांचो टेक्स अंग्रेज लगा रहे हैं ताकी भारतीयां व्यापारीयोंओं को बर्बाद कर सकें । और आप को यह जान कार अश्चर्यी होगा की यह पांचो के पांचों टेक्स आज भी इस देश मे ही चल रहे है । अंग्रेजों ने तो समझ मे आता हैं की भारत को बर्बाद करने के लियें यह टेक्स लगायें थे । कूल मिलाकर इन पांचो टेक्सों को देखें तो १०० रू कि वस्तू पर १२७ रु का टेक्स देना पड रहा था । अब भारतीयें व्यापारीओं का माल महंगा होगया और दुसरी तरफ ब्रिटीश माल पर सभी प्रकार के टेक्सों को हटा दिया गया ताकी ब्रिटीश माल सस्ता हो जायें और गांव - गांव मे उनका माल बिके । जब १०० रु की वस्तू पर १२७ रु देने पडे तो वह व्यापारी बर्बाद हो जाएगा मर जाएगा या तो वोह व्यापारी बईमान बन जायेंगा तो दोनो ही तरफ से लडू अंग्रेजो के हाथ मे है कयोकी व्यापारी बईमान बना तो , बईमान व्यक्ति कभी आंख मिलाकर बात नही कर सकता तो यो हमारा गुलाम बन जयेंगा या बर्बाद हो गाया तो भी वो हमारा गुलाम बन जायेंगा । तो व्यापारी किस प्रकार बर्बाद हुयें यह समझ मे आ गया होगा । अंग्रेजों ने इस देश मे टेक्सेशन का सीस्टाम क्यों लायें इस देश के व्यापारीओं को बईमान बनाने के लिए कि वो टेक्स कि चोरी करें या बर्बाद हो जाए । इस के लियें उन्होने अलग- अलग विभाग भी बनाए,सेंट्राल एक्साईज विभाग, सेल्स टेक्स विभाग, ईन्काम टेक्स विभाग,ऑक्ट्रोये टेक्स विभाग और टोल टेक्स विभाग । जो आज भी चल रहे हैं । आप ध्यान से सोचे कि अंग्रेज तो इस देश को बर्बाद करना चाहते थे इसलिए टेक्सेशन का सीस्टाम लयें परन्तू आज भी वही टेक्सेशन का सीस्टाम चल रहा है क्यों ? अंग्रेजों ने ईन्काम टेक्स लगाया तो कितना लगाया ९७% टेक्स । मतलब १०० रू पर ९७ रु टेक्स आप को केवल ३ रू ही मिलेंगें । और आप को यह जान कर अश्चर्यी होगा की देश आजाद हुआ १९४७ को और तब भी इस देश मे टेक्स ९७% ही लगता रहा १९७१-७२ तक क्यों ? परन्तू आजाद होने के बाद भी हमरी सरकार इन टेक्सो को क्यों लगा रही हैं ? बल्की आज तो और भी कई और नये टेक्स लगा दियें गयें हैं । यदि विदेशी देशो में एक से दो प्रकार के टेक्स ही लगायें जाते है जबकी भारत मे ६४ प्रकार के अप्रत्याक्ष वं एक परोक्ष टेक्स लगाए जाते है । मान लीजियें १०० रुपये के वस्तू पर कूल टेस्क को जोडा जाये तो ६५% तो टेक्स ही देना पड्ता है यानि १०० रु की वस्तू १६५ रु मे मिलेगी । डब्लू.टी.औ. कुल १२४ देशो में लागू है २००५ के राजीव भाई के व्याख्यां में बता रहें है एक देश हैं अमेरीका किस पर पछ्ले २० वर्षो से संसाद मे बहस चल रही हैं परन्त वह वैट टेक्स नहीं ला रहे आपने देश में और उनमें से १२३ देश एसे हैं जिनदेशों मे वैट टेक्स तो लागू हुआ परन्तू एक भी अप्रत्याक्ष टेक्स नहीं हैं इस देश में और हमारे देश मे १४ अप्रत्यक्ष टेक्स हैं और उस्में वैट १५वां टेक्स और आ गया हैं ब्राजील मे संसाद मे और संसाद के बाहर २० वर्षो तक बहस की लोगों ने व्यापरियों ने और सुझाव दियें सुके अनूसार वैट टेक्स आया और वैट टेक्स आने से पहले सारे के सारे अप्रत्यक्ष टेक्सों को समाप्त किया फिर वैट टेक्स आया और भारत में उस पर कोई बहस नही हूई उसे हस्ताक्षर करने से पहले और जिन मत्रीयों ने यह वैट लाया उन्हों ने भी इसे लाने से पहले नहीं पडा । जर्मनी मे भी १२-१५वर्षॉं तक बहस चली । मुख्य बात जो कहना चाहता हू वो यह कि सभी १२३ देशो मे जहॉ पर भी वैट टेक्स आया हैं वहॉ पर कोई भी अप्रत्यक्ष टेक्स नहीं हैं और उनमें से २३ देश तो एसे है जिनमें प्रत्यक्ष टेक्स भी नहीं हैं केवल एक ही टेक्स हैं वैट टेक्स । उदहारण के रुप में स्वीजार्लेण्ड में एक ही टेक्स हैं वैटे टेक्स वहॉ पर इनकम टेक्स भी नही सेल्स टेक्स भी नहीं कोई दुसरा टेक्स नहीं । और उदहारण दूं लग्ज्मबर्ग एक देश है, पनामा एक देश है एसे २३ देश हैं दुनियां में जिनमें वैट के अलावा कोई दुसरा टेक्स नहीं हैं ८४ देश एसे हैं दुनियां में जहॉ पर दो टेक्स हैं एक इनकम टेक्स और दुसरा वैट टेक्स हैं । अब भारत की बात करें । भारत में एक प्रत्यक्ष टेक्स हैं और १४ अप्रत्यक्ष टेक्स हैं और उपर से वैट टेक्स भी क्यों ? जिदेशो में प्रत्यक्ष टेक्स और अप्रत्यक्ष टेक्स दोनो समाप्त हो गयें और केवल एक ही टेक्स रह गया तो उनके तो मजे हो गए परन्तू भारत में ? अब आपको पता चले की जिन देशो में इन सारे टेक्सों को हटा कर वैट टेक्स लाया उस वैट टेक्स की दर भारत के वैट टेक्स की तुलना मे कम हैं तो ? और वहॉ पर वैट टेक्स भी सभी वसतूओं पर नहीं है । और एक बात बडी महत्व की हैं सभी वैट टेक्स वाले देशो में एक कानून हैं "क्सटोडीयान कानून" इस मतलब सरकार टेक्स की मालीक नहीं हैं वह केवल क्सटोडीयान हैं उस टेक्स के पैसे को देश के विकास में लागा सकती हैं या सम्भाल के रख सकती हैं इसका मतलाब उस पैसे की मालीक नहीं हैं मालीक तो टेक्स भरने वाला हैं जब उसे पैसे की अवश्यकता हो तो सरकार को सारा पैसा अपको देगीं । मान लिजियें कि यदि आप जर्मन मे रह रहें हैं और आपने २१ वर्षो तक वैट टेक्स भरा और उसके बाद आप उस देश को छोड कर दुसरे देश हमेशा के लियें जाना चाहते हैं तो सरकार आप की टेक्स एक -एक पैसा आप को उसी दिन आप को देगी और आपको एक धन्यावाद पत्र भी देगी । इस प्रकार का नियम है सभी देशो मे जहॉ पर भी वैट टेक्स लिया जाता है भारत को छोड कर । और एक बात यदि कोई भूक्कांप आ गया या बाड आगई तो आप का सब दूकान मकांन बर्बाद हो गया तो भी सरकार आप का सारा टेक्स आप को देगी और अगले तीन वर्षो तक आप से कोई टेक्स नही लेगी । भारत मे एसा कोई नियम नहीं हैं और एसी सम्भावना भी नहीं हैं भारत को छोड कर सभी देशो वैट वाले देशो में यह नियम है सिन्गल पोईन्ट वैट हैं और भारत मे मलटी पोईन्ट वैट है (मतलब एक वस्तू पर एक ही बार वैट टेक्स लगेगा ) और नियम है वैट टेक्स सेन्ट्रालाईज केन्द्र सरकार द्वारा है जबकी भारत में वैट टेक्स राज्य स्तर पर लगता है तो अलग राज्य तो मे अलग नियम तो बहुत समस्या होती है वैट को लेकर यदि वस्तू एक राज्य से दुसरे राज्य में जायें तो । एक और नियम हैं  वैट टेक्स कि दर बहूत कम हैं भारत कि तूलना में । और एक बात जो टेक्स अधीकारी होता हैं  उसे कोई जूडीशीयल अधीकार नही होता हैं (मतलब आपको जेल भेजने का अधिकार या आपकी सम्पति को जब्त करके उसकी निलामी करने का अधिकार एसा कोई भी अधिकार टेक्स के किसी भी अधिकारी को नही हैं ।) भारत मे एक और वैट टेक्स मे डाला गया हैं की सभी अंतराष्ट्रीयां संस्था प्रोफीटेव्ल और नोन प्रोफीटेव्ल पर कोई वैट टेक्स नहीं लगेगा । इसका मतलब सभी चर्च अब टेक्स से बहार होंगें और सभी मंदिरों पर अब टेक्स लगेगां क्यों ?हमारे देश मे शराब पर वैट टेक्स नहीं है और लाट्रीओं पर टेक्स नहीं हैं परन्तू दूध पर वैट टेक्स हैं नमक पर वैट टेक्स हैं  मतलब सरकार चाहती हैं की हम शराब पियें दूध को छोड कर । मैं कैसे यह मानू की यह देश अजाद हो गया हैं ।


अंग्रेजों की संसाद में एक बहस चल रही है कि भारत का कुल व्यापार कितना है ? तो इस का जवाब विलीयम एडम भारत के कई रेवेनू के अधिकारियों कि मद्द से सर्वे करने के बाद देता है कि भारत का कुल व्यापार १८३५-५० तक १/३ प्रतिशत था , या दुसरी तरह से कहें के  सारी दुनियां का कुल ट्रेड मान लिजियें की १०० बिलीयान डालार हो तो उस समय केवल भारत का ट्रेड ३३बिलीयान डालार था या तीसरी तरह से कहें तो भारत का कुल निर्यात दुनियां के कुल निर्यात का ३३% था । जब्कि उस समय भारत में कोई बडा प्रोजेक्ट नहीं था और ना ही इतने ईन्वेश्मेंटर थे । वो भी तब जब अंग्रेज भारत को बर्बाद करने पर तुले हूए थे ।  आज क्या स्तिति है ? आज भारत का कुल उत्पाद दुनिया  के कुल उत्पाद का ०.०१ प्रतिशत हैं । तो हम विकास कर रहे है या विनाश की और बड रहे हैं जरा सोचीयें ।


तो जरा सोचो के भारत पर जब कोई टेक्स नही लगा था तब तक भारत ३३% का उत्पादन करता था और आज भारतीयों पर टेक्स लगा -लगा कर बर्बाद कर दिया है आजादी के बाद भी हमारा खुन चूसा जा रहा हैं टेक्सो के द्वारा हमे आज भी बईमान बनाया जा रहा है ताकि हम गलत बात का विरोध ना कर सकें और वो अपनी मन्शाओं को पुरा करते रहें । 


विलीयम एडम के सर्वे के अनुसार १८३५-५० तक भारत में स्टील बनाने वाली १०००० फेक्ट्रीयां थी ।  भारत कि उन १०००० स्टील की फेक्ट्रीयांओं से कुल स्टील का उत्पादन ८० से ९० लाख टंन होता था सन १८३५-५० तक और आज भारत में इतने बडे - बडे स्टील पलान्ट, इतनी मशीनें , इतने विदेशी कम्पनियां और इतने सारे स्टील के फेक्ट्रीयां परन्तू कुल उत्पादन ७० से ७५ लाख टंन प्रति वर्ष था । उनमे जो स्टील बन रहा था उसकी गुणवता (कूवालीटी ) क्या थी ?  उस पर वर्षो -वर्ष जंग नहीं लगता था इतना बडीयां गुण्वत्ता का स्टील भारत में बनता रहा १८३५-५० तक । जिसका जीवांत उदाहरण हैं मेहरोली में लोहे का अशोक स्तम्भ । और आज का स्टील यदि वर्षा के पानी में छोड दें तो ३ महीने में ही लोहे पर जंग लग जायेंगा । और यह स्टील कि सबसे अधिक फेक्ट्रीयां सर्गूजा मध्य प्रदेश मे है क्यों की दूनियां का सबसे अच्छा आईरन ऑर सबसे अधिक मात्रा में भारत के सर्गूजा में पाया जाता हैं, और जो इस तकनिक को जानते है उन्हे हम आदिवासी कहते हैं उन के पास कोई डीग्री नहीं है परन्तू वह सबसे अच्छा स्टील बनाने की कला जानते हैं परन्तू हम मनते हैं कि जिसके पास कोई डीग्री नहीं हैं वो अशिक्षीत हैं ,मुर्ख हैं । जबकी उनके पास सबसे उत्तम तकनीक हैं जो आज धीरे -धीरे   लूप्त होती जा रही है हमरी गलती के कारण । अंग्रेजों ने इस कला को बर्बाद करने के लिये भी एक कानून ( ईण्डीयन फोरेस्ट एक्ट)  बनाया था जिसके अनूसार स्थानीयें आदीवासीओं को लोहे से अच्छी स्टील बनाना जानते थे उन्हे खादानो से कंचा माल नही लेने देते थे । यदि वह खदानों से कचा माल लें तो उनको ४० कोडे मारे जाते थे और उस पर भी यदि वह व्यक्ति नहीं मरे तो उसको गोली मार दी जाती थी इसना सख्त कानून बना दिया ।  तो बीना कचां माल के वह लोग भूखे मरने लगे । और उन्हीं  खदानों से अंग्रेज लोहा खोद - खोद कर ले जाते थे । और स्टील की विभिन्न वस्तूएं बनाकर हमरे बाजारो में बेचा करते थे । आज भी वोही कानून( ईण्डीयन फोरेस्ट एक्ट) चल रहा है भारत के मूल निवासी (आदिवासी) लोहा नही ले जा सकते । जबकी जापान कि काम्पनी निपन्डेरनू  (एसी ही और भी विदेशी कम्पनियां) । आज भी कचा माल कोडीयों केदाम खोद - खोद कर ले जा रही है और स्टील बनाकर हमे ही उंच्चे दामॉ पर बेच रही हैं ।  आज भी सर्गुजा मे कुछ आदिवासी लोग हैं जो उस तकनीक को जानते है परन्तू उनको आज भी उसी कानून के कारण स्टील नही लेने दिया जाता । तो हम कैसे अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारे जब हमे ही हमारा कचां माल नही लेने दिया जाता और विदेशी कम्पनियों को कोडीयों के दाम पर कचां माल खोद-खोद करे लें जा रही हैं । और क्यों कोई राजनितिक पार्टी , भारत देश के लोग इस पर विचार नही मरते । क्यों नहीं इस कानून को रद्द किया जाता हैं । कैसे में मानू के यह देश आजाद हो गया ?
अशोक स्तम्भ
भारत में बहुत अच्छा कपडा बनाने वाले बडीयां कारीगर होते था वो कपडा इतना बारीक बुनाई करते थे की कोई मशीन भी नहीं कर सकती । उस कपडे के थान के थान एक छोटी सी अंगूठी में से निकल जाते थे । पूरी दुनियां मे प्रसिध्द था भारत का कपडा १८३५-५० तक । भारत मे उस समय तक दो ही वस्तूएं सबसे जादा निर्यात होती थी कपडा और मसाले । अंग्रेजो का कपडा लंका शयर और मान्चेस्ट्र का कपडा बिक नही पाता था क्योंकी भारत का ही कपडा इतना बडीयां होता था । तो फ्री ट्रेड के नाम पर अंग्रेजों ने उन सब करीगरों के अंगूठें और हाथ कटवा दियें  । सुरत में १००००० बहतरीन कारीगरों के अंगूठें और हाथ कटवा दियें । बिहार मे एक इलाका हैं मधूबनी । मधूबनी मे २५०००० से ३००००० कारीगरों के हाथ कटवा दियें अंग्रेजों ने । इस पर अंग्रेज बडा गर्व करते है, कयोकी भारत का सबसे बडा उद्योग हैं कपडा मील्ले और कारीगर नही रहेंगे तो कपडा मील्ले नही चल सकती और जब कपडा मील्ले धराशाही होगी तो भारत की अर्थव्यवस्था भी धराशाही हो जाएगी । यह एक वार्ता हैं ब्रिटीश की संसाद मे चल रही हैं । और उसके बाद अंग्रेजों ने यह कर दिया हैं  ताकी अंग्रेजो का माल (लंका शयर और मान्चेस्ट्र का कपडा ) भारत मे बिक पायें । और अंग्रेजों ने अपने कपडों पर से सारे टेक्स हटा लियें और भारत की कपडा मील्लों पर अतीरीक्त टेक्स लगाया । सुरत की कपडा मील्लों पर १०००% अतीरिक्त टेक्स लगा दिया । 
ताकी यह उद्योग बन्द हो जायें । और लंका शयर और मान्चेस्ट्र का कपडा  बिकने लगे ।

अब कपडा बनाने के लियें कच्चा माल अंग्रेजों को चाहीयें तो भारत का कोटन ब्रिटेन मे जाने लगा । तो अंग्रेजों को बडा परीशाम करना पडता था तो अंग्रेजों ने जहां - जहा पर अच्छे कोटन (कच्चा माल) मिलता था वहां - वहां पर अंग्रेजों ने अपने स्वार्थ के लियें रेलगाडी चलाई इस देश में । आपको लगता होगा कि अंग्रेज नही आते तो रेलगाडी नही होती इस देश में परन्तू आप यह नही जानते की अंग्रेजो ने रेल इस लियें चलाई ताकी अंग्रेजे भारत के गांव - गांव से कोटन को ईकाठा करके मुम्बाई ले जा सके और मुम्बाई के बन्द्रगाह से जहाजॐ के द्वारा कोटन को ब्रिटेन ले जा सके । और बाद में इसी रेल  का एक और प्रयोग होने लगा । अंदोलन को कुचलने के लियें जल्दी से जल्दी भारत के विभिन्न क्षेत्रो मे सेना को पहुंचाने के लिए रेल का प्रयोग भी किया जाने लगा ।  अंग्रेजों के सबसे पहले रेल जो चलाई है मुम्बाई से थाना के बीच में ट्राईल के रुप में । जब बाद मे प्रयोग सफल हो गया तो सबसे पहले अंग्रेजों ने रेल चलाई है मुम्बाई से अहमदाबाद मे बीच में जो कपास के लिये सबसे अच्छा उत्पादान करते हैं ।  अब अंग्रेजों के कपास को ईकाठा कर के मुम्बाई के बंद्र्गाह से कपास के जहाज तो भर कर भेजना शुरु कर दियें परन्तू इंग्लेंड से खाली जहाज आते थे तो खाली जहाज समून्द्र में डुब जाते थे । तो इसके लियें उन्हो ने समून्द्री जहाजों में नमक भर कर भेजना शुरु कर दिया । समून्द्री जहाजों में नमक भर कर ईंग्लेंड से आते थे और मुम्बाई के बन्द्रगाह पर नमक डाल देते थे । और यहां से कपास भर कर ले जाते थे । भारत में उस समय तक सभी लोग स्वादेशी नमक ही खाते थे । परन्तू अग्रेजों ने स्वदेशी नमक पर भी टेक्स लगा दियें और अपना नमक टेक्स फ्री बेचने लगें ताकी सभी उनका नमक खाएं । इस पर महात्मा गांधी जी ने डांडी सत्यग्रह किया । ६ अप्रेल १९३० में महात्मा गांघी जी ने एक मूठ्ठी हाथ मे लेकर कसम खाई थी के भारत में विदेशी नमक नहीं बिकने दूंगा । और आज भारत में कितने ही विदेशी नमक बिक रहे हैं पत्ता नहीं गांघी जी कि आत्मा को कितना दुःख होता होगा यह देख कर । हमारी सरकारो ने विदेशी कम्पनियों को नमक बनाने के लियें भी अनूमती दे दी । जरा आप बातायें कि नमक बनाने मे कॉन सी हाईटेक तकनीक हैं । समून्द्र का पानी एक जगह ईकाठा कर लेते हैं और धूप में  पानी भाप बन कर ऊड जाता हैं और नमक नीचे रह जाता हैं क्या भारत के लोग इतना भी नहीं कर सकते हैं । कि विदेशी कम्पनियाओं को नमक बनाने के लिये अनूमती दे दी । गांधीजी कि आत्मा कितने आंसू बाहाती होगी यह देख कर कि जिस देश मे मेने नमक सत्यग्रह किया वहां पर आजादी के बाद भी आज तक विदेशी नमक बिक रहा हैं जरा सोचीयें कि यह कितना बडा नेशनल क्राईम हैं । अंग्रेजों ने जो - जो व्यवस्थायें बनाई सभी इस देश मे आज भी चल रही हैं । तो मैं यह कैसे मानू की यह देश आजाद हो चूका हैं ।



Nov 26, 2013


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