भारत मे खेती और किसानों की बर्बादी के विभिन्न कारण


खेतीउसके पीछे एक गंभीर कारण है। अंग्रेजों का भारत में आना और अंग्रेजों द्वारा भारत में अपनी सरकार का चलाना। अंग्रेजों की सरकार जब भारत में चलना शुरु हुर्इ है तो अंग्रेजों की सरकार ने बहुत ही व्यवस्थित तरीके से भारतीय समाज को तोड़ने का काम किया। मैंने कल के व्याख्यान में आपको बताया था कि अंग्रेजों की सरकार ने भारत को व्यवस्थित तरीके से तोड़ने का जो काम किया उसके लिए उन्होंने जो नीतियां बनायी थी उसमें सबसे पहली नीति यह थी कि भारतीय समाज को आर्थिक रुप से पूरी तरह से तोड़ दिया जाए और जब भारतीय समाज आर्थिक रुप से बर्बाद हो जाएगा तो फिर भारतीय समाज को राजनैतिक रुप से तोड़ दिया जाए और जब भारतीय समाज राजनैतिक रुप से टूट जायेगा। तो फिर भारतीय समाज को सान्स्क्रतिक और सामाजिक रुप से तोड़ दिया जाए।
   
अब अंग्रेजों ने अपनी पहली नीति का पालन करते हुए भारतीय समाज को आर्थिक रुप से जो तोड़ा। उसमें कल के व्याख्यान में मैंने आपको विस्तार से बताया था कि उधोगों को किस तरह से तोड़ा गया। व्यापार को किस तरह से तोड़ा गया और आज के व्याख्यान में मैं बताऊँगा कि क्रषि को किस तरह से तोड़ा गया। किसानों को कैसे बर्बाद किया गया। क्योंकि क्रषि हमारे समाज का मुख्य केन्द्र थी और क्रषि हमारे देश के व्यवसाय का मुख्य आधार होती थी। तो अंग्रेजों ने भारतीय क्रषि को बर्बाद करने के लिए तीन-चार तरह के कानून बनाये।
   
सबसे पहला कानून जो अंग्रेजों ने भारत की क्रषि को बर्बाद करने के लिए बनाया वो किसानों के ऊपर लगान लगाने का कानून था। किसानों के ऊपर टक्स लगाने का कानून था। 1760 के पहले इस देश में एक बड़े इलाके में किसानों के ऊपर कभी-भी लगान नहीं लिया गया। अंग्रेजों के पहले इस देश में कुछ ही राज्यों को छोड़ दिया जाए तो बाकी किसी भी राज्य में किसानों पर लगान नहीं लिया जाता था। जैसे मालाबार का एक बहुत बड़ा इलाका होता था। जिसको आज हम दक्षिण भारत के रुप में जानते है। उस मालाबार के इलाके में 1760 के पहले कभी-भी किसानों पर लगान नहीं लिया गया।  मैसूर राज्य के इलाके में 1760 के पहले किसानों पर कभी लगान नहीं लगाया गया। इसी तरह से भारत के और दूसरे इलाके भी थे। जिन इलाकों में अंग्रेजों के आने के पहले तक कभी-भी लगान की वसूली की बात ही नहीं हुर्इ। लेकिन अंग्रेजों की सरकार ने क्या किया भारत में जब उनका साम्राज्य स्थापित हुआ और उनकी सरकार चलना शुरु हुर्इ उसी समय उन्होंने भारत के किसानों पर लगान लगाना शुरु किया और आप कल्पना कर सकते हैं के कितना लगान वसुलती थी अंग्रेजों की सरकार, कितना टक्स वसूलती थी भारत के किसानों से। भारत के किसानों पर अंगे्रजों की सरकार ने किसानों के कुल उत्पादन का पचास प्रतिशत तक टक्स लगा दिया था। मैंने जैसे कल आपको बताया था कि भारत के उधोगों को बर्बाद करने के लिए अंग्रेजों ने भारत के उधोगों पर 10-12 तरह के टक्स लगाए थे। इसी तरह से भारत के किसानों को बर्बाद करने के लिए अंगे्रजों ने भारत के किसानों पर टक्स लगाए थे और जो सबसे पहला टक्स भारत के किसानों पर लगाया गया। जिसको लगान के रुप में आप जानते हैं वो पचास प्रतिशत होता था। माने किसान जितना कुल उत्पादन करता था अपनी खेती में, उसका पचास प्रतिशत उत्पादन अंग्रेजों की सरकार छीन लेती थी। जो किसान अंग्रेजों की सरकार को अपने उत्पादन का पचास प्रतिशत हिस्सा नहीं देता था। उस किसान की हत्या करवा देना, उस किसान की झोपड़ी जला देना। उस किसान की संपत्ति को नीलाम करवा देना, उस किसान के गाय, बैल खोल के ले जाना, उस किसान को कोडे से मारना, उस किसान को गाँव की जाति से बहिष्Ïत करवा देना। यह सब अंग्रेजों की सरकार उनको दंड के स्वरुप में दिया करती थी। तो किसान को मजबूरी में अपने उत्पादन का पचास प्रतिशत हिस्सा अंग्रेजों की सरकार को देना पडता था। और मैंने आपको यह बताया कि जो किसान नहीं देते थे उनको गोली मार दी जाती थी। जो किसान नहीं देते थे उनको कोडे मारे जाते थे। जो किसान नहीं देते थे उनके घर जला दिये जाते थे। जो किसान इस तरह से लगान नहीं देते थे अंग्रेजों को, उनको गाँव से बहिष्Ïत करवाया जाता था। इस तरह के अत्याचार अंग्रेजों की सरकार किसानों पर करती थी।

   
तो, एक तो अंग्रेजों की सरकार ने भारत के किसानों को जो बर्बाद किया उसमें सबसे पहला जो कारण था वह यह कि उन्होंने भारत के किसानों पर टक्स लगा दिया। लगान वसुलना शुरु कर दिया।  1760 से लेकर लगातार 1890 तक, 1900 तक इस तरह का लगान किसानों से वसूला जाता था। तो आप सोच सकते हैं कि लगातार 100-150 वर्षों तक अगर किसानों से पचास प्रतिशत उत्पादन छीन लिया जाए हर साल उनकी खेती का, तो किसान तो बर्बाद होते ही चले जायेंगे। दूसरा क्या काम किया अंग्रेजों की सरकार ने - किसानों को बर्बाद करने के लिए दुसरा काम अंग्रेजों की सरकार ने यह किया कि किसानों की जो जमीनें होती थी। खेत होते थे। उनको बेचने का एक सिलसिला शुरु करवा दिया इस देश में। आप जानते हैं  कि अंग्रेजों के आने के पहले तक भारत में जमीन बेची नहीं जाती थी। खेत इस देश में कभी बेचने की वस्तु नहीं रहा। किसान की जमीन - उसको अपनी माँ की तरह से मानता है किसान। और किसान इस देश में कहते रहे हैं  कि जिस तरह से माँ का सौदा नहीं हो सकता। उसी तरह से जमीन कभी खरीदी-बेची नहीं जाती और भारत का किसान जो खेती करता रहा है। उस खेती को करने के पीछे उसके मन में जो धारणा रही है। वो यह कि यह खेती तो र्इश्वर की दी हुर्इ है। यह जमीन तो र्इश्वर की दी हुर्इ है। र्इश्वर की बनार्इ हुर्इ प्रÏति से यह जमीन मुझको मिली है। इसलिए इस जमीन को बेचने का अधिकार मुझको नहीं है। तो किसान कभी जमीन को बेचता नहीं था इस देश में। इस देश में जमीन नहीं बेची जाती थी। कभी-भी इस देश में दूध नहीं बेचा जाता था। कभी-भी इस देश में दुध से उत्पन्न होने वाली तमाम दूसरी चीजें नहीं बेची जाती थी। उसको पाप माना जाता था भारतीय समाज में भारतीय सभ्यता में। तो अंग्रेजों ने क्या किया कि कानून बनाया एक ऐसा जिससे जमीनों को खरीदा और बेचा जा सके। और अंग्रेजों ने पहली बार इस देश में जमीन को खरीदने और बेचने की परम्परा शुरु करवा दी और बाद में जब जमीने बिकने लगीं तो अंग्रेजों की सरकार ने किसानों से जमीनें जबरदस्ती खरीदना शुरु कर दिया।

   
हमारे देश में अंग्रेजों की सरकार ने भारत के किसानों की जमीन छीनने के लिए जो सबसे पहला कानून बनाया उस कानून का नाम है 'लेण्ड एक्यूजीशनस एक्ट। उसको अगर हिन्दी में कहा जाए तो 'जमीन हड़पने का कानून जो आज भी चलता है इस देश में। यह कानून अंग्रेजों ने बनाया था। करीब 150-200 साल पहले। यह जो लेण्ड एक्यूजीशनस एक्ट था। वो अंग्रेजों की सरकार ने क्यूँ बनाया ताकि भारत के किसानों से जमीन छीन ली जाए और भारत के किसानों को बर्बाद कर दिया जाए।
   
अंग्रेजों की एक पध्दति थी काम करने की। वो जिसको भी बर्बाद करते थे उसके लिए पहले कानून बनाते थे। जैसे मान लीजिए अगर अंग्रेजों को आपकी जेब काटनी है तो वो जेब नहीं काटेंगे। पहले जेब काटने का कानून बनायेंगे और उस कानून के बाद जब आपकी जेब कटना शुरु हो जाएगी तो अंग्रेज कहेगें कि हम तो कानून का पालन कर रहे है। अब आपकी जेब कटती है। तो कट जाये। माने - सीधे जेब नहीं काटेंगे। लेकिन जेब काटने का कानून बनायेंगे और फिर कहेगें हम कानून का पालन कर रहे हैं। इसमें आपकी जेब कटती है तो कट जाए। तो उन्होंने किसानों को बर्बाद करने के लिए सीधे कुछ नहीं कहा। उन्होंने यह नहीं कहा कि हम किसानो को बर्बाद करेंगे बलिक किसानों को बर्बाद करने के लिए कानून बना दिया। फिर उन कानूनों का पालन करवाना शुरु किया उन्होंने और किसान उसमें बर्बाद होना शुरु हो गए। तो पहला कानून लगा दिया टक्स के रुप में। लगान के रुप में। और दूसरा कानून लगा दिया अंग्रेजों ने भारत में किसानों की जमीन हडपने के लिए जिसका नाम रखा गया 'लेण्ड एक्यूजीशन एक्ट।

   
अंग्रेजों के बड़े-बड़े बेर्इमान और भ्रष्ट अधिकारी इस देश में हुए। एक अंग्रेज आफीसर था। जिसका नाम था डलहौजी। बहुत ही बेर्इमान और भ्रष्टाचारी आफीसर था उस जमाने का। डलहौजी क्या करता था कि जिस गाँव में जाता था। उस गाँव के किसानों की जमीनें छीनता था। गाँव-गाँव के किसानों की जमीनें छीन-छीन कर उन जमीनों को 'लेण्ड एक्यूजीशन एक्ट के नाम पर अंग्रेजों की सम्पत्ति के रुप में घोषित किया जाता था। डलहौजी ने किस तरह से इस देश के किसानों की जमीनें छिनी हैं और किस तरह से वो अंगे्रजी सम्पत्ति बनायी गयी है!


इस तरह से भारत के किसानों को अंग्रेजों ने बर्बाद किया। जमीन हडपकर और जमीन हडपने का कानून बनाकर।   एक तीसरा तरीका और अपनाया भारत के किसानों को अंग्रेजों ने बर्बाद करने के लिए। अंग्रेजों ने भारत के समाज का सर्वे कराया था। सर्वेक्षण कराया था। और भारतीय समाज का सर्वेक्षण कराके अंग्रेजों की सरकार ने इस बात का अंदाजा लगवाया कि यहाँ की खेती मूलत: किस आधार पर टिकी हुर्इ है। अगर भारत की आर्थिक स्थिति को पूरी तरह से चौपट करना है, बर्बाद करना है। तो भारत की खेती को बर्बाद करना ही पडेगा। भारत के उधोगों को भी बर्बाद करना पडेगा।
   

तो भारत की खेती को बर्बाद करने के लिए अंग्रेजों ने पहले सर्वे कराया कि भारत की खेती को कैसे बर्बाद किया जाए।  अंग्रेजों ने जब सर्वेक्षण करा लिया तो उनको एक बात यह पता चली कि भारत का किसान जो खेती करता है। उसका केन्द्र बिंदू है गाय। और उसका केन्द्र बिंदु है बैल। बैल गाय के बछडे़ होते है। बछड़े बैल बनते है। बैलों से खेत जोता जाता है। फिर गाय दूध देती है। किसान दूध पीता है। उसमें से शकित आती है तो खेत में मेहनत करता है। गाय गोबर देती है। उस गोबर का खाद बनाता है। खाद को खेत में डालता है और खेत की शकित बढ़ाता है। गाय मूत्र देती है। मूत्र को किसान कीटनाशक  के रुप में प्रयोग में लाता है। तो गाय जो है वो भारतीय क्रषि व्यवस्था के केन्द्र में है। यह अंग्रेजों की सरकार को पता चल गया सर्वेक्षण करा के। तो अंग्रेजों ने एक कानून और बना दिया कि भारत में गाय का कत्ल करवाओ। तो 1760 में इस देश में अंग्रेजों के आदेश पर गाय का कत्ल होना शुरु हो गया। कुछ लोगों को ऐसा लगता है  और वो लोग कहते भी हैं कि राजीव भार्इ अंग्रेजों से पहले भी तो जो मुसलमान राजा थे। वो भी तो गाय का कत्ल करवाते थे। मैं आपको जानकारी देना चाहता हूँ कि एक-दो मुसलमान राजाओ को छोडकर, भारत में किसी भी राजा ने गाय का कत्ल नहीं करवाया। मुसलमानों के राजाओं के जमाने में तो भारत में ऐसा कानून रहा है कि जो गाय का कत्ल करे उसको फाँसी की सजा दी जाए। यह अंग्रेज थे जिन्होने गाय का कत्ल करवाने के लिए व्यवस्थित रुप से एक कानून बनवा दिया और सन 1760 से भारत में गाय का कत्ल करवाना अंग्रेजों ने शुरु किया।

   
गाय का कत्ल करवाते तो अंग्रेजों को दो फायदे होते थे। एक तो भारत के किसान का जो सबसे बड़ा पशुधन था गाय। वो खत्म होता था। गाय मरती थी तो दूध कम होता था। गाय मरती थी तो गोबर कम होता था। गोबर कम होता था तो खाद कम होती थी। गाय मरती थी तो मूत्र नहीं मिलता था। किसानों के लिए जो किटनाशक दवायें बनती थीं उसमें कमी आती थी। गाय का दूध नहीं मिलता था तो किसानों की शकित कम होती थी। तो लगातार गाय के कत्ल होते चले जाने के कारण भारत की खेती का भी नाश होना शुरु हो गया और अंग्रेजों ने बहुत ही व्यवस्थित तरीके से इस देश में कत्ल कारखाने खुलवा दिए। अंग्रेजों की सरकार ने पूरे देश में लगभग 300 से ज्यादा कत्ल कारखाने खुलवाये। जिनमें गाय और गौवंश का कत्ल किया जाता था। हजारों की संख्या में लाखों की संख्या में गाय और गौवंश का कत्ल होता था। गाय का मांस यहाँ से भेज दिया जाता था, इंग्लैंड में जाता था। अंग्रेजों की सरकार के जो सिपार्इ होते थे वो जो गाय का मांस खाते थे। आप जानते हैं युरोप के देश की जो प्रजा है यह जो गोरी प्रजा है। यह गाय का मांस सबसे ज्यादा खाती है। जितनी गोरी प्रजा है पूरी दुनिया में इसको गाय का मांस सबसे अच्छा लगता है। तो गाय कत्ल होता था भारत में। उसका मांस इंग्लैंड जाता था। और गाय का कत्ल कर के अंग्रेजों की फौज जो भारत में रहती थी। उसको मांस बेचा जाता था। उसको मांस दिया जाता था।

   
तो भारत के किसानों को बर्बाद करने के लिए जो तीसरा काम अंग्रेजों ने किया वो गाय के कत्ल करवाने के बाद में अंग्रेजों को ऐसा लगा कि सिर्फ गाय के कत्ल करवाने से बात नहीं बनेगी। गाय जहाँ से पैदा होती है। उस नंदी का कत्ल पहले करो, तो अंग्रेजों ने पहले नंदी का कत्ल करवाना शुरु किया और बहुत ही व्यवस्थित पैमाने पर गाय और नंदी का कत्ल अंग्रेजों ने करवाया। हम लोगों ने जो दस्तावेज इकठठे किये हैं उनसे पता चलता है कि 1760 से लेकर 1947 के साल तक अंग्रेजों ने करीब 48 करोड़ से ज्यादा गाय और बैल का कत्ल करवाया। और यह जो 48 करोड़ गाय और नंदियो के कत्ल करवा दिये। मैं कभी-कभी कल्पना करता हूँ कि वो गाय नहीं काटी गर्इ होती। वो नंदी नहीं काटे गए होते तो आज हिन्दुस्तान में गाय की संख्या हमारी आबादी से तीन गुनी ज्यादा होती। कम से कम इस देश में देड़ सौ करोड़ से ज्यादा गाय और बैल होते लेकिन अंगे्रजों ने बहुत ही व्यवस्थित तरीके से यह कत्ल करवा कर हिन्दुस्तान के किसानों का सत्यानाश करवाया।

   
फिर उसके बाद अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान के किसानों का सत्यानाश करने के लिए एक चौथा काम किया और चौथा काम उन्होंने क्या किया कि इस देश के किसानों की जो क्रय शकित थी। उसको कम करवाओ - माने किसान जो खेती करता है। खेती के साथ-साथ कुछ और भी उधोग कर सकता है। पशुपालन का काम कर सकता है। दूसरे कर्इ काम कर सकता है और उससे जो उसकी क्रय शकित बढ़़ती है, उसकी समृध्दहि बढ़़ती है, उसकी संपतित बढ़़ती है। उसको कम करवाओ। तो अंग्रेजों ने क्रषि और पशुपालन दोनों को अलग-अलग करवा दिया। पहले खेती के साथ पशुपालन बिलकुल जुड़ा हुआ था। लेकिन फिर अंग्रेजों ने नीति ऐसी बनार्इ कि क्रषि अलग हो गर्इ और पशुपालन बिलकुल एक अलग तरह के बात हो गर्इ। अंग्रेजो ने फिर भारतीय समाज में एक-एक करके उन जातियों पर अत्याचार करने शुरु किये जो जातियां सबसे ज्यादा पशुपालन करती थी। हमारे समाज में जिन जातियों को हम पिछडी जातियां कहते हैं। नीचे दर्जे के जातियां कहते है। वास्तव में यह भारत के समाज की रीड़ की हडडी रही है। यहीं जातियां रही है जिनके पास सबसे ज्यादा हुनर रहा है। सबसे ज्यादा कौशल रहा है। यही जातियां रही हैं जिनके पास सबसे बड़ी टेक्नोलाजी रही है। और यहीं जातियां रही है जिनके पास सबसे ज्यादा हुनर और कौशल इस बात का रहा है कि पशुओं की समृध्दहि कैसे करायी जाए और पशुओं की संख्या कैसे बढ़़ायी जाए।
   

तो अंग्रेजों ने हमारे देश की ऐसी जातियों पर अत्याचार करने शुरु किये जो जातियां हमारे देश में पशुपालन के काम में लगी हुर्इ थी और धीरे-धीरे पशुओं की संख्या - एक तरफ तो गाय का कत्ल करवा के कम कर दी। दूसरी तरफ हमारे देश में जो पशुपालन करने वाली जातियां थीं उनको अंग्रेजों ने इतना बुरी तरह से प्रताडित किया, अत्याचार किये उन सबके ऊपर कानून बनाकर कि धीरे-धीरे पशुपालन का काम वो लोग छोड़ते चले गए और विस्थापित होते चले गए।
   

इस तरह से अंग्रेजों ने भारत के किसानों को व्यवस्थित रुप से बर्बाद करने का काम शुरु किया। और यह बर्बादी कितनी आयी। 1760 से लेकर 1850 के साल तक या 1860 के साल तक हिन्दुस्तान की खेती बुरी तरह से चौपट हो गयी। किसान बुरी तरह से बर्बाद हो गए और मात्र सौ साल के अंदर में हिन्दुस्तान के किसानों की गरीबी दिखार्इ देने लगी। दारिæय इस देश में दिखार्इ देने लगा और जिस तरह से किसानों की बर्बादी की अंग्रेजों ने, उसी बर्बादी के कारण फिर इस देश में भुखमरी आयी और अकाल पड़ना शुरु हुए। हमारे देश में अंग्रेजों के जमाने में जितने अकाल पडे़ हैं उनमें से एक या दो अकाल को छोड़ दिया जाए तो बाकी सब अकाल अंग्रेजों की नीतियो के कारण पड़े। मौसम के कारण नहीं पडे़। हम लोगों को कर्इ बार यह गलत फहमी हो जाती है कि बारिश नहीं हुर्इ होगी। सुखा पड़ गया होगा इसलिए अकाल पड़ गया होगा। हम लोगों को कर्इ बार यह गलत फहमी हो जाती है कि मौसम का दुष्चक्र होगा। कुछ मौसम में परिवर्तन आया होगा भयंकर तरीके से। इसलिए भारत में अकाल पडे़ होगे। भारत में अकाल मौसम की मार से नहीं पडे़। भारत में जितने भी अकाल पड़े वो अंग्रेजों की गलत नीतियों के कारण पड़े।
   

मैंने बताया खेती को बर्बाद करना। किसानों को बर्बाद करना। किसानों से लगान वसूलना। पचास प्रतिशत किसानों से उत्पादन टक्स के रुप में ले लेना। किसान जो पशुपालन कर रहे है। उन पशुपालन करने वाले किसानों पर अत्याचार करना। किसान जो अपने गाँव के बावड़ी और कुओं की व्यवस्था बना सकते हैं। उन सब व्यवस्थाओं को किसानों के हाथ से छीन लेना और अंग्रेजों की सरकार के हाथ में चला जाना। जो जंगल किसानों की संपत्ति माने जाते थे, जो जंगल गाँव की संपत्ति माने जाते थे और जिन जंगलों से किसानों को अपनी खेती करने के लिए मदद में आने वाली तमाम तरह की चीजें मिलती थी। उन जंगलों का अंग्रेजों की सरकार ने सत्यानाश करवाया।
    

एक और तरीका अंग्रेजों ने अपनाया इस देश के किसानों को - खेती को बर्बाद करने के लिए। 1865 के साल में अंग्रेजों ने एक कानून बनाया इस देश में।  उस कानून का नाम था 'इंनिडयन फारेस्ट एक्ट और यह कानून लागू हुआ 1872 में और आज भी यह कानून सारे देश में चलता है। इंनिडयन फारेस्ट एक्ट का कानून अंग्रेजों की सरकार ने इसलिए बनाया था कि इस कानून के बनने से पहले जो जंगल होते थे वो गाँव की संपत्ति माने जाते थे। तो गाँव के किसानों की सामुदायिक हिस्सेदारी जंगलो पर होती थी। अंग्रेजों ने क्या किया कि जो जंगल गाँव समाज की संपत्ति होते थे। जो जंगल गाँव के किसानों की संपत्ति होते थे। उन जंगलों को अंग्रेजी सरकार की संपत्ति घोषित करवा दिया। कानून बना के और उसी कानून का नाम है 'इंनिडयन फारेस्ट अक्ट। फिर अंग्रेजों ने उस कानून को कितनी सख्ती से लागू करवाया कि अंग्रेजों की सरकार के जो ठेकेदार होते थे वो जंगल कटवाते थे। जंगल से लकडि़या लेके जाते थे। और भारत का कोर्इ भी किसान अगर जंगल में जाकर लकड़ी काट लाए तो उसको सजा दी जाती थी। तो भारत का किसान, भारत का आदमी जंगल से लकड़ी काट नहीं सकता। अंग्रेजों ने कानून बना दिया और अंग्रेजों की सरकार जो थी उनके जो ठेकेदार होते थे वो जंगल से लकड़ी कटवाते थे।
    

तो जंगल के जंगल साफ करवाना शुरु किया अंग्रेजों की सरकार ने इस कानून के आधार पर और जंगल खत्म होते गए तो फिर किसानों का क्या नुकसान हुआ। आप जानते है जंगल खत्म होते चले जाने के कारण जो मिट्टी का जमाव होता है पेड़ों के आस-पास वो मिट्टी का जमाव छूटने लगता है। अब मिट्टी का जमाव जब छुटने लगता है तो वो मिट्टी बहने लगती है। और मिट्टी बहने लगती है तो नदियों में जाती है। नालों में जाती है। लहरो में चली जाती है। और मिट्टी बह-बहकर जब नदियों में बढ़़ती चली जाती है तो नदियों का स्थर ऊँचा होता चला जाता है। नदियों की गहरार्इ कम होती चली जाती है। लगातार मिट्टी बह-बहकर अगर पानी के साथ आयेगी। पहले जंगल होते थे। पेड़ होते थे। तो पेड़ मिट्टी को बांध के रखता तो बारीश के समय मिट्टी बह नहीं सकती जंगल से। लेकिन पेड़ काट लिए जायेंगे। तो पेड़ों के आस-पास जो जमा की गयी जो मिट्टी है। वो बहना शुरु हो जायेगी और वो मिट्टी पानी के साथ बहकर नदी में जायेगी। और नदियों में जायेगी तो नदियो का जो स्तर है। नदियों की गहरार्इ है वो कम होती चली जाएगी। नदियों में मिट्टी बढ़़ती चली जाएगी तो पानी कम आयेगा नदियों में। और पानी कम आयेगा तो बाढ़ आयेगी और बाढ़ आयेगी तो किसानों की फसल चौपट हो जायेगी। अंग्रेजों ने इस तरह से कानून बना दिया 'इंनिडयन फारेस्ट एक्ट  का और फिर उसका सत्यानाश किसानों को झेलना पड़ा। एक तो जंगलों से मिलने वाली संपत्ति किसानों के लिए बंद हो गर्इ। दूसरा जंगल जो किसानों की सुरक्षा व्यवस्था कर सकते थे वो जंगल फिर धीरे-धीरे खत्म होते चले गए।

    एक काम और किया अंग्रेजों ने, उनकी सरकार ने कि किसान जो कुछ भी अनाज पैदा करता था अपने खेत में उसका मूल्य अंग्रेजों की सरकार तय करती थी। माने पैदा करता था किसान और मूल्य तय करती थी अंग्रेजों की सरकार। तो बड़ी मंड़ीया होती थी, बड़े हाट लगते थे, बड़ी पेठ लगती थी, जिसमें किसान अपना अनाज बेचने के लिए इकठठे होते थे तो अंग्रेजों का बड़ा आफीसर जाता था और उस मंड़ी में जाकर अनाज का दाम तय कर आता था। यह अनाज इस दाम पर बिकेगा। यह अनाज इस दाम पर बिकेगा। माने मेहनत किसान करता था और अनाज का दाम अंग्रेज तय करते थे और जानबुझकर अंग्रेजों की सरकार किसानों की मेहनत से पैदा किए गये अनाज का दाम इस तरीके से तय करती थीं कि किसानों को ज्यादा कुछ मिलने ना पाए। उनको लगातार नुकसान होता चला जाये। उनको लगातार घाटा होता चला जाये। इस तरह का कानून अंग्रेजों ने बना रखा था इस देश में।
   

बाद में अंग्रेजों ने क्या किया कि किसान अपने अनाज को एक गाँव से लेकर दूसरे गाँव में जाये बेचने के लिए तो उसपर भी बंदी लगा दी। एक गाँव का किसान अपने अनाज को लेकर दूसरी जगह जाकर बेच नहीं सकता। एक जिले का किसान अपने अनाज को लेकर दूसरे जिले में जाकर बेच नहीं सकता। इस तरह की सक्त पांबदी अंग्रेजों ने, उसकी सरकार ने लगा दी और इस तरह से किसानों को बिलकुल घेर के रख दिया। अंग्रेजों की सरकार ने कानून बना-बनाकर और यह हर तरह का कानून बनता था और जो किसान उनका पालन नहीं करते थे तो उनको फाँसी दी जाती थी। उनको कोडे लगाये जाते थे।
   

कर्इ बार अंग्रेजों की सरकार किसानों को बर्बाद करने के लिए कुछ इस तरह के भी काम करती थी। जैसे जबरदस्ती किसानों से कुछ खास तरह की फसल पैदा करवायी जाती थी। आप जानते है बिहार के किसानों को अंग्रेज जबरदस्ती नील की खेती करवाते थे। जिस जमीन पर सबसे ज्यादा धान पैदा हो सकता है बिहार में और होता था। उस जमीन पर अंग्रेजों की सरकार जबरदस्ती नील की खेती करवाती थी और किसान जब नील की खेती करने से मना करते थे तो उनके ऊपर अत्याचार किया जाता था। अंग्रेजों की सरकार को क्या रस था नील की खेती करवाने में। अंग्रेजों को नील की जरुरत थी। युरोप में नील बहुत बिकता था। अंग्रेजों के अपने बाजार में नील बहुत बिकता था। और दूसरी मुशिकल यह थी कि नील की खेती करने से खेती बहुत बर्बाद होती थी। तो अंग्रेजों को नील चाहिए युरोप के बाजारों में बेचने के लिए और उस नील को पैदा करने के लिए भारत के किसान को मजबूर करते थे।        
    

गांधीजी ने जो सबसे पहला सत्याग्रह किया था अपने चंपारण्य के प्रवास में, वो सत्याग्रह इसी सवाल को लेकर था कि अंग्रेजों की सरकार जबरदस्ती किसानों से नील की खेती करवाती थी और गांधीजी कहा करते थे कि यह सबसे बड़ी हिंसा है। किसानों की मर्जी के खिलाफ जबरदस्ती उनसे किसी फसल का पैदा करवाया जाना गांधीजी कहा करते थे कि हिंसा है। तो इसलिए चंपारन का सत्याग्रह करना पड़ा था महात्मा गांधी को। ऐसे ही अंग्रेजों की सरकार ने मालवा के इलाके में किसानों को मारकर पीटकर जबरदस्ती उनसे अफीम की खेती करवाना शुरु किया। यह जो आज हमारे देश में बहुत बदनाम है मालवा का क्षेत्र। और हम लोग अकसर यह कहा करते है कि मालवा के किसान सबसे ज्यादा अफीम पैदा करते हैं। यह जो अफीम पैदा करवाने का किस्सा है यह अंग्रेजों का शुरु करवाया हुआ किस्सा है। हमारे देश में अंग्रेजों के आने के पहले अफीम की खेती नहीं थी। और होगी तो कहीं छुट-पूट, थी बड़े पैमाने पर नहीं थी। लेकिन अंगे्रजों की सरकार ने मालवा के किसानों को मार-पीट कर जबरदस्ती उनपर अत्याचार करके अफीम की खेती करवायी।


बाद में अंगे्रजों की सरकार ने एक कानून और बनाया। जब यहाँ अकाल पडना शुरु हो गया। तो अनाज के उत्पादन में और ज्यादा कमी आ गयी तो अंगे्रजों की सरकार जो लगान वसुलती थी वो लगान में भी कमी आने लगी।   क्योंकि अनाज का उत्पादन कम हुआ तो लगान मिलना कम हो गया तो अंग्रेजों की सरकार ने फिर और ज्यादा अत्याचार करना किसानों के ऊपर शुरु कर दिया और एक बार तो अंग्रेजों की सरकार ने इस कदर अत्याचार किया भारत के किसानों पर आपको याद होगा 1939 में दुसरा विश्व युध्द जब शुरु हुआ और इस दूसरे विश्व युध्द में जब अंग्रेजों की सरकार फंसी युध्द करने के लिए तो अंग्रेजों की सेना दूसरा विश्व युध्द लढ़ रही थी। लेकिन अंग्रेजों की सेना जो युध्द लढ़ रही थी अपने स्वार्थ की पूर्ती के लिए। उस अंग्रेजी सेना के लिए भोजन भारत से भेजा जाता था। अनाज भारत से भेजा जाता था। गो-मांस भारत से भेजा जाता था। अंग्रेजों की फौज लढ़ रही थी दूसरे विश्व युध्द में और दुसरे विश्व युध्द का काफी खर्चा भारत के किसानों को बर्दाश्त करना पड़ता था। दूसरे विश्व युध्द के समय में अंग्रेजों की सरकार ने एक तो किसानों पर टक्स और बढ़़ा दिया था। लगान और ज्यादा बढ़़ा दिया था। भारत के उधोगों पर टक्स बढ़़ा दिया था। भारत के उधोगों पर ज्यादा से ज्यादा भारत के उधोगों से रेवेन्यू कलेक्शन हो सके। युध्द के लिए ऐसी व्यवस्थायें बनायी थी और दूसरी तरफ भारत का भोजन। भारत का अनाज। भारत के गाय का कत्ल करने के बाद मांस अंग्रेजों की फौज को मिल सके लगातार उसकी भी व्यवस्था की थी!

आप जानते है कि जब भारत के अन्न, भारत का अनाज अंग्रेजों की फौज को जाने लगा तो पहले से ही इस देश में अन्न उत्पादन में काफी कमी आ चूकी थी। फिर जो कुछ बचा हुआ अन्न था वो अंग्रेजों ने यहाँ से बाहर भेजना शुरु कर दिया। अपने देश में बेचना शुरु कर दिया था। तो फिर अनाज की कमी और ज्यादा हो गर्इ तो अंगे्रजों ने और एक कानून बना दिया। और वो कानून है 'राशन कार्ड का कानून जो आज भी इस देश में चल रहा है। आप में से बहुत सारे लोग नहीं जानते कि यह राशन कार्ड क्यूँ चलाया गया इस देश में। हम सब के घर में राशन कार्ड तो है। लेकिन वो राशन कार्ड क्यूँ चलाया था। अंग्रेजों ने क्यूँ शुरु किया था यह कानून यह बहुत कम लोग जानते हैं। 1939 के साल में अंग्रेजों ने राशन कार्ड का कानून बनवाया और भोजन और अनाज पर उन्होंने राशनिंग की व्यवस्था शुरु करवायी और यह राशन कार्ड का कानून अंग्रेजों ने क्यूँ बनवाया। क्योंकि यहाँ का अनाज यहाँ का भोजन इंग्लैंड चला जाता था। यहाँ के लोगों को भुखमरी की हालत का सामना करना पड़ता था। तो भारत के लोगों को भुखमरी की हालत का सामना करते हुए लोग जब मरते थे तो अंग्रेजों की सरकार ने लोगों को थोड़ा तसल्ली देने के लिए कानून बना दिया की राशन कार्ड आप ले लो। अंगे्रजों की सरकार से और जिस व्यक्ति के पास राशन कार्ड होगा उसको सस्ते दाम पर अनाज मिल सकेगा। तो जिन लोगों ने राशन कार्ड बनवाये। अंग्रेजों की सरकार के आफिस में जाकर घूस देकर, रिश्वत देकर भ्रष्टाचार करके उन लोगों को ही सिर्फ अनाज मिलता था। बाकी लोगों को अनाज मिल नहीं पाता था। तो इस तरह के अत्याचारी कानून और इस तरह की व्यवस्था अंग्रेजों ने शुरु की थी।


Nov 26, 2013


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    दिनांक : 23 - 25 दिसम्बर 2016 
    स्थान  :  हाईलैंड  पार्क ,
                 डी मार्ट के पीछे ,
                  कोलशेट रोड,
                  कपूरबावाड़ी जंक्शन,
                 ठाणे वेस्ट 
                                    23  दिसम्बर 2016 
                सुबह 09 : 30 से 12 : 30 तक चिकित्सा परामर्श 
              दोपहर 02 : 30 से 05 : 30 तक चिकित्सा परामर्श 
              रात    07 : 00 से 09 : 00 तक व्याख्यान 
                                        24 दिसम्बर 2016 
              सुबह 09 : 30 से 12 : 30 तक चिकित्सा परामर्श 
              दोपहर 02 : 30 से 05 : 30 तक चिकित्सा परामर्श 
               रात    07 : 00 से 09 : 00 तक व्याख्यान 
                                     25 दिसम्बर 2016 
              सुबह 09 : 30 से 12 : 30 तक चिकित्सा परामर्श 
              दोपहर 02 : 30 से 05 : 30 तक चिकित्सा परामर्श 
              रात    07 : 00 से 09 : 00 तक व्याख्यान 
     संपर्क : 8380027016 , 9970666201 
    आप सभी इस शिविर का लाभ अवश्य लें तथा व्याख्यान तीनो दिन जरूर सुनें |