भारत मे खेती और किसानों की स्थिति 200 से 300 वर्ष पहले




खेतीदेश के सभी सम्मानित किसानों - आज के इस व्याख्यान में मैं खेती और किसानों के बारे में जो स्थिति है भारत की, उसके बारे में कुछ कहूँगा। भारत की खेती, भारत के किसान आज जिस स्थिति में है । आज से 150 साल पहले भारत के किसान, भारत की खेती किस हाल में थी। उन दोनों का तुलनात्मक विश्लेषण आज के इस व्याख्यान में मैं करने की कोशिश करुँगा और यह तुलनात्मक विश्लेषण इस दृषिट से होगा कि 200 साल पहले खेती और किसान की स्थिति बहुत अच्छी थी तो आज उसकी समस्या क्या हो गर्इ और उसको फिर सुधारने के लिए कौन सा रास्ता हो सकता है। वो रास्ता हम सारे देश के लोगों को ढुंढना होगा। उस दृषिट से आज के पूरे व्याख्यान में खेती और किसानों के विषय को मैंने शामिल करने की कोशिश की है।


आप सब जानते हैं कि भारत में खेती और कृषि कर्म बहुत ही उच्च दर्जे का व्यवसाय माना गया है और भारतीय समाज में कृषि कर्म और किसानों के लिए खेती करना केन्द्र बिन्दु रहा है। ऐसा कहा जाए कि भारतीय समाज कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर टिका हुआ है तो यह ठीक ही है। और जो समाज कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर टिका हुआ होता है। उस समाज की अपनी कुछ खास तरह की प्राथमिकताएं होती हैं। खास तरह की जरुरतें होती हैं।

   
भारत का समाज पिछले हजारों सालो से कृषि कर्म को केन्द्र में मानकर चलता रहा, तो इसलिए भारत का समाज कुछ विशिष्ट तरह का समाज है। हमारे यहाँ कृषि की जो प्रधानता रही है। उसके पीछे एक तथ्य यह भी है कि भारतीय मौसम और जलवायु कृषि के काफी अनुकूल है। खेती के बहुत अनुकूल है। यहाँ जो मौसम है बहुत सातत्य वाला है जैसे उदाहरण के लिए आज सूरज निकला है तो कल भी निकलेगा, परसों भी निकलेगा, तीन महीने बाद भी निकलेगा, तीन साल बाद भी निकलेगा, बीस साल बाद भी निकलेगा, तीन सौ साल बाद भी निकलेगा, तीन हजार साल भी हो जायेगें तो भी निकलेगा। माने सूरज के निकलने में कही कोर्इ कमी नहीं आने वाली भारतीय जलवायु में, लेकिन युरोप में यह बात सच नहीं है। युरोप में आज सूरज निकला है। कल नहीं भी निकलेगा। युरोप में कल सूरज निकला है,  हो सकता है नौ महीने तक लगातार सूरज नहीं निकलेगा। क्योंकि युरोप के देशों में सामान्य रुप से साल में सिर्फ तीन महीने ही धूप निकलती है। बाकी नौ महीने तो वहाँ धूप निकलती ही नहीं है। सूर्य के दर्शन ही नहीं होते। तो जितना सातत्य भारत की जलवायू में है। भारत के मौसम में है। उतना सातत्य युरोप में नहीं है। उसी के साथ-साथ भारत की जो भूमि है, भारत की जो मिट्टी है खेत की वो बहुत नरम है। युरोप के खेतों की मिट्टी नरम नहीं है बहुत कठोर है। तो जिन देशों के खेत की मिट्टी बहुत कठोर होती है। वहाँ कृषि प्रधान व्यवस्था संभव नहीं होती है। और आप जानते हैं कि खेती के लिए मिट्टी का नरम होना बहुत जरुरी है। इसलिए भारत में कृषि कर्म बहुत प्रधान  रहा। भारत का कृषि कर्म केन्द्र बिन्दू रहा पूरे समाज का। तो उसका सबसे बड़ा कारण है कि यहाँ की जलवायू बहुत अच्छी है। यहाँ की खेती की मिट्टी बहुत अच्छी है।
   

दूसरा, यहाँ के लोगों को मौसम, जलवायू और मिट्टी से जुडे़ हुए जितने कारक हैं। उनका बहुत अच्छा ज्ञान है। अगर यह कहा जाए कि भारत के किसान बहुत विद्वान आदमी हैं तो इसमें कोर्इ शक नहीं है। वो जानता है कि बारिश कब आने वाली है। किसान को मालूम होता है गर्मी कब पडने वाली है। किसान को यह भी मालूम होता है कि सर्दी का समय जो आने वाला है वो कब आने वाला है और किसान उसके हिसाब से अपनी खेती की चर्या को बदल लेता है। बारिश में क्या करना है। गर्मी में क्या करना है। सर्दीयों में क्या करना है। यह सब बातें सामान्य रुप से इस देश का हर किसान जानता है और इसलिए मैं उसको कहता हूँ कि उसको अपने जीवन को चलाए रखने के लिए जो जरुरी कारक हैं उनका बहुत अच्छा ज्ञान है।
   

तो एक तो जीवन का ज्ञान है। दूसरा, मौसम और जलवायू का ज्ञान है। तीसरा, मिट्टी बहुत अच्छी है। चौथा,  यहाँ की जो जलवायु है समसीतोष्ण है। ना तो बहुत गर्मी है ना तो बहुत बारिश है। युरोप के देशों में कभी-कभी तो बहुत सर्दी पडती है। माइनस 40 डिग्री सेंटिग्रेट तापमान हो जाता है। माइनस 20 डिग्री सेंटिग्रेट तापमान हो जाता है। भारत में इस तरह से कभी तापमान बहुत नीचे भी नहीं जाता और कभी ऊपर भी नहीं जाता। तो भारत की जलवायू समसीतोष्ण है। जो खेती के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है और पानी की व्यवस्था इस देश में बहुत प्रचुरता में है। हजारों सालों से इस देश में पानी की मात्रा काफी रही है। बारिश का होने वाला पानी, बारिश से मिलने वाला पानी, जमीन के अंदर मिलने वाला पानी और जमीन के ऊपर तालाबों के माध्यम से मिलने वाला पानी। इन सभी की प्रचुरता भारतीय समाज में काफी लम्बे समय से रही है। इसलिए भारत की खेती बहुत उन्नत रही है और भारत का किसान बहुत उन्नत रहा।
   

तो भारत की खेती और भारत के किसान के उन्नत होने के पीछे जो सबसे प्रमुख कारणों में से एक कारण है। एक तो जलवायू का सातत्य। मौसम का सातत्य। मौसम का लगातार निरन्तर रुप से प्रवाहित होना, पानी की उपलब्ध्ता बहुत अच्छी मात्रा में होना और खेती की जमीन बहुत अच्छी नरम होना, यह तीन बड़े कारक हैं। जिसके लिए भारतीय खेती और भारतीय कृषि कर्म बहुत उन्नत रहा और इतने उन्नत कृषि कर्म के बारे में अगर कभी अंदाजा लगाना हो कि किस तरह की खेती हमारे यहाँ होती रही है 200 साल पहले, 300 साल पहले के मेरे पास कुछ दस्तावेज है। हमारे यहाँ एक बहुत बड़े इतिहासकार हैं प्रोफेसर धर्मपाल उनकी मदद से हम लोगों ने कुछ दस्तावेज देखें  है। वो दस्तावेज यह बताते हैं कि करीब आज से 300 साल पहले भारत की खेती युरोप के किसी भी देश की खेती से बहुत अच्छी मानी जाती थी। उदाहरण ले-ले इंग्लैंड का।   आज से 300 साल पहले इंग्लैंड के एक एकड़ खेत में जितना अनाज पैदा होता था उसकी तुलना में आज से 300 साल पहले भारत के एक एकड़ खेत में उसका तीन गुना ज्यादा अनाज पैदा होता था। उदाहरण से अगर समझना चाहें तो ऐसे समझो कि भारत के एक एकड़ खेत में अगर 50 किवन्टल अनाज पैदा होता था। तो इंग्लैंड के एक एकड़ खेत में मुशिकल से 15-16 किवन्टल अनाज पैदा होता था। तो इंग्लैंड से तीन गुणा ज्यादा उत्पादन भारत के खेतों का रहा है  आज से 300 साल पहले और भारत की उन्नत जिस तरह से खेती रही है ठीक उसी तरह की उन्नत खेती चीन की भी रही। चीन की खेती का उत्पादन भी लगभग इसी तरह का रहा है। जो भारत की खेती में रहा है। दुनिया में दो ही ऐसे देश माने जाते हैं जिनकी खेती पिछले हजारों साल से बहुत उन्नत रही है। जिनके किसान पिछले हजारों साल से उन्नत रहें हैं। चीन और भारत की खेती के उन्नत होने का एक दस्तावेज है और एक प्रमाण है। जो यह बताता है कि लगभग 1750 ।क् के करीब भारत और चीन का दोनों देशों का मिलाकर कुल उत्पादन सारी दुनिया के कुल उत्पादन का सत्तर प्रतिशत होता था। माने पूरी दुनिया में जितना अनाज पैदा हो रहा हैं। पूरी दुनिया में जितना अनाज के साथ-साथ दुसरे सामान पैदा हो रहे है। उधोगों की मदद से जो सामान पैदा हो रहे है  खेती की मदद से जो सामान पैदा हो रहे हैं। उनका कुल उत्पादन पूरी दुनिया में जितना था उसका कुल सत्तर प्रतिशत उत्पादन सिर्फ भारत और चीन का होता था। तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि पूरी दुनिया के सकल उत्पादन का सत्तर प्रतिशत उत्पादन आज से करीब ढार्इ सौ तीन सौ साल पहले भारत और चीन का होता था। तो इन दोनों की खेती और खेती से जुडे हुए उधोगों की  कितनी उन्नती रही होगी।

   
1760 से अंग्रेजों का शासन भारत में शुरु माना जाता है।   तो 1760 के बाद लगातार अंग्रेजों ने भारत की खेती पर ऐसे कानून लगाये, ऐसे अंकुश लगाए कि लगातार भारत की खेती बरबाद होती चली गर्इ। 1760 के बाद 1820 के साल तक अंग्रेजों ने भारत की खेती को काफी नुकसान की स्थिति में पहुँचा दिया अपने कानूनों की मदद से। तो भी पूरी दुनिया में भारत और चीन की खेती का कुल उत्पादन और खेती से जुडे हुए उधोगों का उत्पादन  लगभग 60 प्रतिशत के आस-पास रहा। तो इस बात से अंदाजा लगता है कि कितनी उन्नत खेती और खेती से जुडे हुए उधोग रहे होंगे इस देश में। इसके अलावा खेती और किसानों से जुडे हुए लोगों की समृध्दहि बहुत रही है इस देश में। आज से 200-300 साल पहले तक सबसे ज्यादा समृध्दहिशाली वर्ग इस देश का किसान ही माना जाता रहा। आज से 200-300 साल पहले तक की स्थिति यह है कि समाज का सबसे ज्यादा पैसे वाला वर्ग किसान ही माना जाता रहा और समाज में सबसे अच्छा कर्म खेती का माना जाता रहा।
   
   
एक कहावत इस देश में कही जाती है 'उत्तम खेती, मध्यम वान करे चाकरी कुकर निदान। उत्तम खेती माने खेती सबसे महत्वपूर्ण व्यवसाय है। मध्यम वान माने बिजनेस है जो व्यापार है वो दूसरे नम्बर पर है। और करे चाकरी कुकर निदान माने नोकरी करना तो कुत्ते के जीवन बिताने जैसा माना जाता है। भारतीय समाज में तो खेती सबसे उन्नत व्यवसाय रहा। दूसरे नम्बर पर व्यापार और तीसरे नम्बर पर नौकरी-चाकरी मानी जाती है। यह स्थिति इस देश में आज से 200, 250, 300 साल पहले तक की है।
   

जब अंग्रेज भारत में आए है और सरकार बनाकर उन्होंने भारत में राज्य करना शुरु किया है। तब तक इस देश में खेती की उन्नति और खेती की स्थिति बहुत अच्छी है। भारत के किसानों के और खेती की स्थिति अच्छी होने के कुछ प्रमाण हैं दस्तावेज में ।  जो यह बताते हैं  कि हमारे देश में करीब-करीब 1750 के आस-पास मैसूर नाम के राज्य में एक लाख से ज्यादा तालाब हुआ करते थे। हिन्दुस्तान में आजादी के पहले करीब साड़े सात लाख गाँव होते थे और आश्चर्य इस बात का निकलता है कि दस्तावेजों के आंकड़ो के अनुसार कि इस देश का कोर्इ भी गाँव ऐसा नहीं कि जिसमें तालाब न बना होता और आँकडे़ तो यह बताते हैं  कि बहुत सारे गाँव इस देश में ऐसे रहे है जहाँ एक से ज्यादा तालाब एक ही गाँव में रहे हैं। तो साड़े सात लाख गाँव का देश था भारत आजादी के पहले और करीब-करीब हर गाँव में एक तालाब की व्यवस्था थी तो लगभग साडे़ सात लाख तालाब पूरे देश में रहे होंगे। इससे ज्यादा भी हो सकते हैं क्योंकि कुछ गाँव में एक से ज्यादा तालाब होने की व्यवस्था थी। 
   

तो तालाब बहुत बड़ी संख्या में रहे है। कुएं बहुत बड़ी संख्या में रहे हैं। बावडियां बहुत बड़ी संख्या में रही है। बारिश की होने वाली एक-एक बूँद को हिन्दुस्तान में पूँजी की तरह से बचाने की परंपरा रही है। जिस राजस्थान को आज हम जानते हैं और हम राजस्थान के बारे में ऐसा मानते हैं कि बहुत मरु भूमि है राजस्थान की जहाँ पानी की बहुत कमी है। जहाँ पानी की बहुत किल्लत है। उस राजस्थान में ऐसी परम्परा पिछले हजारों साल से है कि बारिश की गिरने वाली एक-एक बूँद को संचित रखने की सबसे बड़ी परम्परा अगर इस देश में कहीं है तो राजस्थान में। आप राजस्थान में जार्इए जैसलमैर के इलाके में जहाँ पर यह माना जाता है कि सबसे ज्यादा सुखा पडता है। उस जैसलमैर के इलाके में आप आजू-बाजू के गाँव में घूमिए, हर गाँव में आपको तालाब मिल जायेगा और  जैसलमैर शहर के नजदीक ही सबसे बड़ा तालाब मौजूद है। जो करीब चार-पाँच सौ साल पुराना है और आज भी उसमें  पानी है। कभी वहाँ लहराते तालाब हुआ करते थे। बड़े-बड़े तालाब हुआ करते थे। यह तो अंग्रेजों के कुछ कानून थे और अंग्रेजों की कुछ व्यवस्थायें थी। जिन्होंने  भारत के तालाबों को सुखा दिया और भारत के तालाबों को बर्बाद कर दिया।
    

तालाबों की बड़ी गहरी परम्परा रही है इस देश में और कृषि का उत्पादन उसी के आधार पर है। पानी जितनी प्रचुर मात्रा में है उतना ही उत्पादन अधिक होता रहा है इस देश में इसलिए खेती का उत्पादन इस देश में बहुत रहा है और खेती के उत्पादन में एक महत्वपूर्ण कारक और है। भारत में खेती के साथ-साथ पशुधन भी बहुत बड़ी मात्रा में रहा है। पशु की संख्या भी इस देश में बहुत बड़ी मात्रा में रही है और कृषि कर्म को टिकाए रखने के लिए पशुओं की संख्या इस देश में बड़ी जबरदस्त मात्रा में रही है। करोड़ों-करोड़ों की संख्या में जानवरों को पालने की परम्परा इस देश के लोगों में बहुत गहरे से बैठी हुर्इ है। तो कृषि है। कृषि के लिए केन्द्र जो बन सकती है। वो गाय इस देश में रही है। बैल रहे  है इस देश में, उनका गोबर है। गोबर से होने वाली खाद है। गाय का मूत्र है। उससे बनने वाले जो कीटनाशक बन सकते हैं इस देश में उनकी परम्परा रही है।
   

तो भारतीय कृषि इस तरीके से बहुत उन्नति के रास्ते पर जाती रही है। क्योंकि पशुओं की संख्या बहुत, तालाबों की संख्या बहुत, जमीन की अच्छार्इ बहुत है। मिट्टी बहुत नरम है। किसानों को जल वायू का बहुत अच्छा ज्ञान है। यहाँ पर बीजों की संख्या भी बहुत अच्छी रही है। हमारे देश में आज से 150-200 साल पहले तक चावल की, धान की, एक लाख से ज्यादा प्रजातियां होती थी। जो दस्तावेज उपलब्ध हैं वो बताते है कि भारत के किसानों के पास एक लाख से ज्यादा चावलों की किस्में होती थी। इस देश में सैकड़ों किस्म के बाजरे के बीज थे। सैकड़ों किस्म के मक्के के बीज थे। सैकड़ों किस्म के ज्वारी के बीज थे। सैकड़ों किस्म की प्रजातियाँ इस देश में रही हैं अनाजों की और यहाँ की सम्पन्नता बहुत ज्यादा रही है। बायोडायवर सिटी यहाँ की बहुत ऊँची रही है। तो इसलिए कृषि कर्म भी ऊँचा रहा है इस देश का।
    

आज करीब हमारे देश में 300 साल पहले के आँकड़े है जो बताते हैं कि बि्रटेन से तीन गुणा ज्यादा उत्पादन हमारे खेतों का है। आँकड़े यह बताते हैं कि कृषि कर्म इस देश का बहुत उन्नत रहा है। पशुओं के पालन के काम भी बहुत उन्नत रहे है।

तो अचानक से क्या हो गया इस देश में जो आज इस देश का किसान सब से गरीब दिखार्इ देता है ? अचानक से क्या हो गया इस देश में कि आज इस देश की खेती ही सबसे ज्यादा बर्बादी के रास्ते पे जाती हुर्इ दिखार्इ देती है ?अचानक से क्या हो गया इस देश में जो आज इस देश के खेती और किसानों की बर्बादी की स्थिति हमको चारों तरफ दिखार्इ देती है ?



Nov 26, 2013


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